Wednesday, May 12, 2021

मन्नतों की कोई जैसे बारात है।

मन्नतों की कोई जैसे बारात है।
हर-तरफ़ देखो खुशियों की बरसात है।

ईद के चाँद की चांदनी में सनम।
भीग कर आज चन्दन हुआ मेरा तन।
तर बतर हो गया खुश्बुओं से जहाँ..
मेरा रंगने  लगा  तेरी  चाहत में मन।
घिर गया बादलों से भी दिल का गगन.
हर-तरफ़ देखो खुशियों की बरसात है।

मन्नतों की कोई जैसे बारात है।

इश्क़ की रागिनी गा रही है हवा।
मोहब्बत के सुर भी मिलाए फ़िजा।
तुम मिले तो महकती हैं तनहाइयाँ
झूमती गाती फिरती हैं परछाइयाँ।

अब न रखना कोई फ़ासला दरमियाँ!
मेरी चाहता का देना मुझे तुम सिला।
रोशनी से यूँ जीवन भी भर जाएगा!
मोहब्बत का बन जाएगा काफ़िला।

ये ख़ुदा की कोई मुझको सौग़ात है।
हर-तरफ़ देखो खुशियों की बरसात है।
:
©दिव्यांशु  पाठक

सैरे-अदम ( संसार का तमाशा )

सैरे-अदम = संसार का तमाशा

वह जाने से पहले ख़बर भी नहीं देते ।
जो कहते हैं कि  अलविदा  न  कहना।

तुम हो तो ये साँसें हैं ख़ुश्बू है प्यार है!
तुम नहीं तो  जहाँ में  मुझे नहीं रहना।

ये तन्हाई की वफ़ा क़ाबिले तारीफ़ है!
बस इसे कभी मुझसे ज़ुदा नहीं होना।

'पंछी' ये सब तो महज़ सैरे-अदम है!
यहाँ कभी कोई किसी का नहीं होना।

माँ की मोहब्बत।

माँ की मोहब्बत लफ़्ज़ों में आ नहीं सकती!
ये रूह उनकी सीखों को भुला नहीं सकती।

जिसके आँचल में हमको जीना आया है।
मेरी भूल आदर्शों को हिला नहीं सकती।

किसी ने सच ही कहा है कि 'माँ' ख़ुदा है।
और कोई ताक़त इंसां बना नहीं सकती।

इन आँखों में तेरी ममता तैरती रहती है।
इसलिए यूँ पलकें आँसू ला नहीं सकती।

जिसके सर पे उसकी माँ का आशीर्वाद हो।
कोई मुश्किल उसको यूँ सता नहीं सकती।

क़द्र करो उसकी 'माँ' ही सृष्टि का वरदान है।
'पंछी' हर कोई उसकी जगह पा नहीं सकती।
©दिव्यांशु पाठक

तुम ही मेरा संसार हो।


बरसों से जो मैंने किया
तुम वो मेरा इंतज़ार हो।
टूटा नहीं तोड़े से जो  
तुम वो  मेरा  इक़रार हो।

न जाने कितने ग्रीष्म गुज़रे 
और सावन भी जले?
झुलसे हुए स्वप्नों को लेकर 
पतझड़ों में हम चले।

उम्मीद थी बरसेंगे बादल 
भीग जाएगी धरा यह।
खिल उठेंगे  पुष्प फिर से  
सुप्त से जो हो गए । 

अँगड़ाई लेकर यह समां 
एहसास तेरा दे रहा ।
शोर धड़कनें कर रहीं 
मन मुग्ध मेरा हो रहा।

फिर से फ़िज़ाओं में मुझे 
तेरा ही आभास हो।
है जतन मिलने का यह 
या कोई अभ्यास हो।

तुमसे ही जीवन है मेरा 
और तुम ही मेरा प्यार हो।
हर ख़ुशी तुमसे ही तो 
तुम ही मेरा संसार हो॥
:
©दिव्यांशु पाठक

Wednesday, April 28, 2021

प्रथम वैदिक सेनानी (भारत का स्वतंत्रता संग्राम 1845 ई. से 30 अक्टूबर 1883)

प्रथम वैदिक सेनानी 
(भारत का स्वतंत्रता संग्राम 1845 ई. से 30 अक्टूबर 1883)
♦️♦️♦️♦️♦️♦️♦️
पृष्ठभूमि

1500 से 1000 ईसा पूर्व
🔻
सदियों पहले इस धरती पर
कलरव खुशियों का होता था।
उगता था सूरज ज्ञान लिए-
चंद्रमा प्रेम मय होता था।

विद्वान और विदुषी रहते-
नित् वेद पाठ भी होता था।
आदर्श सभ्यता थी अपनी!
जग विश्व गुरु भी कहता था।

🔻 पदाक्रांत भारत ( 1800 ई. से 1900 ई.) 

हर तरफ़ निराशा के बादल 
थे नफ़रत के तूफ़ान चले-
बचपन बैठा था अंधकार में
तो नारी की क्या बात भले।

पथभ्रष्ट हुई जीवनशैली-
थी जाति पात फल फूल रही,
भारत माता के आँगन में-
अँग्रेजी तूती बोल रही।
मद्य मस्त फिरंगी से आँचल में
इक घाव नया नित होता था।
हर तरफ़ मचा था शोर कोई-
नित नित् ताण्डव सा होता था।
था पाखण्डों में धर्म फंसा-
शंकर मरघट में सोता था।

अधिकार किसानों के छीने
व्यापार महाजन से बीने-
कर लगा लगा कर नए-नए
राजाओं के दल-बल भी चीन्हे,
ख़ौफ-ज़दा हर भारतीय-
बस मन ही मन में रोता था।
🔻
हर तरफ़ मचा था शोर कोई
नित नित ताण्डव सा होता था।
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जब पीड़ा मन की फूट पड़ी
आशा सबकी सब टूट पड़ी
तब अंधकार के आँगन से
एक ज्योति पुंज बाहर निकला-
फिर दावानल में कूद पड़ा

♦️1824 ई.-1883 ई.♦️

वो युवा ढूंढता सत्य फिरे-
उसकी थी शास्वत अभिलाषा
भूखें और भ्रष्ट विचारों को
कर दया दयानंद की आशा।

फिर मूल मूल ने जो पाया
वेदों को उसने अपनाया
आओ लौटो वेदों की ओर
वह वेद पताका लहराया।

विद्या और घोर अविद्या का
वह भेद खोलने निकला था।
आडंबर मत मतवान्तर की
वह पोल खोलने निकला था।

नारी शिक्षा पर जोर दिया
आश्रम का शुद्ध प्रयोग किया
वह बालक और विधवाओं का
निर्वैर हितेषी होता था।

अभिशाप दासता बतलाया,
वह 'स्वदेश' शब्द को भी लाया
ये प्रथम संकल्प उसका ही था
सपना 'स्वराज्य' का दिखलाया।

यथायोग्य व्यवहार करो सब,-
अक्सर ऐसा कहते थे।
कुछ ग़लत अगर दिख जाए तो-
फिर वे चुप नहीं रहते थे।

लेकर के वेद पताका को-
गुरु-आश्रम से बाहर निकले।
करना प्रचार जिस सत्य का था!
उसका प्रसार करने निकले।

♦️1865 ई. ( राजस्थान में प्रवेश )♦️
🔻
प्रथम धौलपुर में ठहरे
तोड़ना चाहते थे पहरे
किल्विस की ध्वनि में मोहित से-
थे लोग यहाँ के तब बहरे।
जब सुनी नहीं स्वामी जी की !
ऋषिवर थोड़े से क्रुद्ध हुए-
फिर मूरख कह वे निकल लिए-
लेकिन थोड़े से क्षुब्ध हुए।
वेदों का ज्ञान समझने को-
जाने मन क्यों नहीं होता था?
हर तरफ़ मचा था शोर कोई
नित नित ताण्डव सा होता था।
था पाखण्डों में धर्म फंसा!
शंकर मरघट में सोता था।

व्यथित हृदय वह सत्य पथिक
कुछ दिन में जयपुर पहुँच गए।
वहाँ शैव और वैष्णव लड़ते-
वह दोनों का मुह नोंच गए।
अचरौल के राजा पर इसका-
गहरा प्रभाव इस तरह हुआ-
मूर्ति-पूजा छोड़ी उसने और मदिरा का त्याग किया।
सफ़ल हुआ उपदेश ऋषि का-
फिर पुष्कर को कूँच किए-
शिवलिंग स्थापन का विरोध कर-
मन्दिर सेवक को ज्ञान दिए।
सत्य ज्ञान का सेवन कर के-
जन जन नतमस्तक होता था।
हर तरफ़ मचा था शोर कोई,
नित नित ताण्डव सा होता था।
था पाखण्डों में धर्म फंसा!
शंकर मरघट में सोता था।

♦️( नबम्बर 1866 - 26 अक्टूबर 1874 )♦️
🔻
अजमेर रुके जब ऋषिराज,
तब कर्नल ब्रुक से बात चली
प्रतिबंधित गौ-वध करना है!
ये बात ब्रुक को लगी भली।
पर वायसराय ही कर सकता,
सो एक पाती उसको भी लिख दी।
♦️
जयपुर आए फिर स्वामी जी
उत्तर भारत की तरफ़ चले-
प्रयाग आगरा और काशी,
लालची बालची सण्डों को-
कर्मकाण्ड पाखण्डों को-
नकली पण्डित और पण्डों को,
स्वामीजी ने तब फ़टकारा
देकर प्रमाण वेदों के सब-
उनके झूठ को ललकारा।
स्वामी जी की ललकारों में-
एहसास क्रांति का होता था।
हर तरफ़ मचा था शोर कोई,
नित नित ताण्डव सा होता था।
था पाखण्डों में धर्म फंसा-
शंकर मरघट में सोता था।

♦️( 1874 ई. से 1878 ई. बम्बई में )♦️
🔻
कलकत्ता मिर्जापुर जाकर-
वैदिक प्रकाश को फैलाया..
आग्रह किया अनुयायियों ने
बम्बई में आओ स्वामी जी-
हम भी तो भटके भूले हैं-
हमको भी राह दिखाओ जी।
तब स्वामीजी बम्बई पहुँचे-
स्थापित आर्य समाज किया।
उद्देश्य बता कर वो अपना-
फिर से धोरों में आ पहुँचे।
इस देव दूत को एक पल भी
आराम क़ुबूल न होता था।
हर तरफ़ मचा था शोर कोई,
नित नित ताण्डव सा होता था।
था पाखण्डों में धर्म फंसा-
शंकर मरघट में सोता था।

♦️( मार्च 1881 - 31 मार्च 1883 ई. )♦️

'वैदिक धर्म सभा' उनकी
जयपुर में आर्य समाज हुई।
चित्तोड़ गए फिर स्वामी जी
सज्जन सिंह जी से भेंट हुई।
धर्म और कर्तव्य परायण-
लोग वहाँ पर रहते थे।
तीरथ सा गढ़ है भारत का-
स्वामीजी भी कहते थे।
तब ही जाकर के उदयपुर-
'परोपकारिणी सभा' बनाई थी।
उपकार किया जन सेवक बन-
अपकार नहीं कोई होता था।
हर तरफ़ मचा था शोर कोई ,
नित नित ताण्डव सा होता था।
था पाखण्डों में धर्म फंसा-
शंकर मरघट में सोता था।

♦️( 31 मार्च 1883 से 30 अक्टूबर 1883 ई. सांय 6 बजे तक )♦️
🔻
सर प्रताप जोधाणा में ऋषिवर को आमंत्रित किए।
स्वागत कर उपदेश सुना-
और वैदिक संदेशा लिए।
राजन् के बारे में पूछा-
उनके बारे में पता किए।
जब पता लगा स्वामी जी को,
मोहित जसवन्त कंचना पर-
दुत्कारा उसको बतलाया -
राज धर्म भी सिखलाया।
तुम सिंह पुत्र होकर के भी
ऐसा अनर्थ क्यों करते हो।
हे राजन् थोड़ी लाज करो-
इस कुतिया पर क्यों मरते हो।
स्वामीजी के वचन सुने राजा-
पानी -पानी हो गया वहीं-
चिढ़कर कर 'नन्नी' ने भोजन में,
चाकर से ज़हर दिलाया था।
सीसा पीसा था दूध में भी-
फिर उनको वह पिलवाया था।
इस तरह उदित वह आर्य श्रेष्ठ,
अस्त हो चुका सूर्य बना।
वैदिकता की किरणें लेकिन-
संसार सदन में छोड़ गया।
♦️♦️♦️♦️♦️
इक सत्य कथन की कटुता ने,
योगी के प्राण परख डाले--
निज हत्यारे को माफ़ किया!
पर अपने प्राण ही तज डाले।
 
हे दयानन्द तुझको प्रणाम- मन नित नतमस्तक होता है।
हर तरफ़ मचा फिर शोर वही
फिर आज ज़रूरत आपकी है।
कब आओगे तुम ऋषिराज?
अब इंतज़ार नहीं होता है।
♦️♦️♦️♦️♦️♦️♦️
© दिव्यांशु पाठक
       अध्यापन

Wednesday, December 2, 2020

लोकतंत्र में जन-आन्दोलनों का क्या महत्व है?

'विश्वगुरु' बनने का ख़्वाब देखती
मेरे देश की नई पीढ़ी को दिशा देने के लिए
अभी बड़े सुधार की ज़रूरत है।
हमें उनको बताना होगा कि-
शान्ति, न्याय,और क़ानून स्थापित
करने के लिए हमें पहले उनका
उलंघन करना बंद कर देना चाहिए।
हमें नैतिक मूल्यों की समझ के साथ
बच्चों और महिलाओं को
सुरक्षित रखना होगा।
यह ज़िम्मेदारी सरकार के साथ
आपकी अपनी भी है।
जन-आन्दोलनों को
सकारात्मक और स्वास्थ्य क़दम के रूप में
लोकतंत्र का हिस्सा बनना है विरोधी नहीं। #राजस्थानपत्रिका के द्वारा पूछा गया प्रश्न- लोकतंत्र में जन-आन्दोलनों का क्या महत्व है?
:
मेरी अभिव्यक्ति के रूप में पेश है मेरा ज़बाब----
:
जन-आन्दोलन को देखकर तो ऐसा प्रतीत होता है कि अपने हितों को लेकर देश सज़ग होकर शासन और प्रशासन के सामने अपना मत रखने खड़ा हो गया है।
:
लोकतंत्र में जन-आन्दोलनों का क्या महत्व है?
:
उम्मीदों से भरी सत्ता में जब राजनीतिक-आर्थिक नीतियां किसी वर्ग या जन-साधारण के हितों का हनन करती हैं तो वह वर्ग एकजुट होकर अपना मत रखता है।
जनता के द्वारा जनता के लिए चुनी गई सरकार के निरंकुश होकर निर्णय लेने पर अंकुश लगाने के लिए भी लोकतंत्र में जन-आन्दोलनों का बड़ा महत्व है।
पिछले दो दशकों में देश ने कई बड़े जन-आंदोलन देखे और कई बेहतरीन और आवश्यक बदलाब भी हुए।इनका सीधा लाभ देश की अवाम को भी मिला।

हमने भूख, बेरोजगारी,अशिक्षा, भ्रष्टाचार के साथ लड़ते हुए निरंतर विकास का रास्ता चुना।दुर्भाग्य से जन-आन्दोलनों के स्वरूप भी बदलते देखे।इस बदलाब ने देश की अवाम को आपस में बाँटने का काम किया।आन्दोलन महज़ उपद्रव बनकर रह गए।देश को बड़ी 'जन-धन' की हानि भी उठानी पड़ी।बेशक़ आन्दोलन के नाम पर समाज को लाभ हुआ पर कहीं न कहीं राजनीतिक-आर्थिक और सांस्कृतिक रूप से मानवाधिकार और लोकतंत्र का दुरुपयोग भी।

जन-आन्दोलनों को मैं अवाम के विकास के लिए किए गए प्रयासों में सकारात्मक और स्वास्थ्य क़दम मानता हूँ।लेकिन इसके नाम पर जो स्वेच्छाचार होता है वह ठीक नहीं।

'विश्वगुरु' बनने का ख़्वाब देखती मेरे देश की नई पीढ़ी को दिशा देने के लिए अभी बड़े सुधार की ज़रूरत है।हमें उनको बताना होगा कि- शान्ति, न्याय,और क़ानून स्थापित करने के लिए हमें उनका उलंघन करना बंद करना होगा।नैतिक मूल्यों की समझ के साथ बच्चों और महिलाओं को सुरक्षित रखना होगा।
:
आपको मेरा ज़बाब कैसा लगा अपनी प्रतिक्रिया देकर बतायें बहुत बहुत स्वागत है।
#पाठकपुराण की ओर से #सुप्रभातम #yqdidi #yqhindi #yqbaba 

Sunday, November 29, 2020

राजस्थान के इतिहास की झलकियाँ - 12

जब तक प्रतिहारों में साहसी-पराक्रमी शासक उत्पन्न होते रहे उनका राज्य विस्तार भी हुआ।शुरुआती दौर में मण्डोर के प्रतिहार- नागभट्ट,शिलुक,बाउक शक्तिशाली रहे।उज्जैन और कन्नौज के प्रतिहारों में भी कई प्रतिभासंपन्न योद्धा हुए।समूचे राजस्थान पर अधिकार कर उन्होंने- गुहिल,राठौड़,चौहान तथा भाटियों को सामन्त बनाकर राज्य किया।जैसे ही इनकी केंद्रीय शक्ति कमज़ोर हुई तो सामन्तों ने अपने स्वतंत्र राज्य स्थापित कर लिए।जिस राजस्थान की मिट्टी में उनका उदय हुआ,उसी राजस्थान को वे हमेशा के लिए अपना न रख सके। :
डॉ गोपीनाथ शर्मा लिखते हैं कि -
जोधपुर के शिलालेखों से यह प्रमाणित होता है कि प्रतिहारों का अधिवासन मारवाड़ में लगभग छठी शताब्दी के द्वित्तीय चरण में हो चुका था।उस युग में राजस्थान के पश्चिमी भाग को "गुर्जरत्रा" कहते थे इसलिए प्रतिहारों को "गुर्जर-प्रतिहार" या गूजर सम्बोधन मिला। विद्वानों के अनुसार इनकी राजधानी जो कि कर्नल टॉड के अनुसार 'पीलोभोलो' लिखा है वो आधुनिक भीनमाल या बाड़मेर हो सकता है।
:
यूँ तो भगवान लाल इन्द्रजी ने इनको कुषाणों के समय बाहर से आए विदेशी माना है।बम्बई-गजेटियर ने भी इनको विदेशी माना है।डॉ भण्डारकर भी इनको एक जाति-विशेष के रूप में मानते हैं।
:
डॉ ओझा इनको विदेशी नहीं मानते और प्रतिहारों का शासन 'गुर्जरत्रा' क्षेत्र में होने से इनको गुर्जर-प्रतिहार कहा है।
:
मुहणोत नैणसी ने प्रतिहारों की 26 शाखाओं का उल्लेख किया और लिखा है कि राजस्थान ही नहीं अपितु गुजरात,काठियावाड़,मध्यभारत एवं बिहार के भी बहुत से क्षेत्र इनके अधीन रहे।
:
ग्वालियर के अभिलेख में प्रतिहारों को क्षत्रिय और सौमित्र यानी लक्ष्मण के वंशज और कवि राजशेखर ने भी प्रतिहार नरेश महेन्द्रपाल को 'रघुकुल-तिलक' कहा है।
:
प्रतिहारों की 26 शाखाओं में से एक मण्डोर के सबसे प्राचीन और प्रमुख हैं।इनके बारे में हमें जोधपुर शिलालेख जो कि 836 ई. में प्राप्त हुआ मिलती है।इसी तरह घटियाले से भी दो शिलालेख प्राप्त हुए जो कि 837 ई. और 861 ई. के हैं।इन शिलालेखों के अनुसार-
:
प्रतिहारों के गुरु जो कि हरिश्चंद्र के नाम से जाने जाते हैं उनकी दो पत्नियाँ थी एक क्षत्राणी दूसरी ब्राह्मणी।ब्राह्मणी से उत्पन्न पुत्र ब्राह्मण-प्रतिहार कहलाये और क्षत्राणी पत्नी भद्रा से उत्पन्न क्षत्रिय-प्रतिहार हुए।भद्रा से चार पुत्र हुए-
भोग-भट्ट,कदक,रज्जिल और दह।चारो भाइयों ने बड़े होकर मांडव्यपुर ( मण्डोर ) को जीत लिया और उसकी सुरक्षा के लिए प्राचीरों का निर्माण कराया।
:
ओझा के अनुसार हरिश्चंद्र का समय छठी शताब्दी के आसपास का होना चाहिए।उसके वंशजों में नागभट्ट प्रथम जो रज्जिल का पोता था बड़ा पराक्रमी हुआ।उसने अपने राज्य का विस्तार कर मण्डोर से 60 मील दूर मेड़ता को अपनी राजधानी बनाया।नागभट्ट के उत्तराधिकारियों के बारे में तो जानकारी नहीं है किन्तु उसकी दशवीं पीढ़ी में "शीलुक" हुआ जिसने वल्ल मण्डल के भाटी राजा देवराज को हराकर अपना राज्य बढ़ाया।शीलुक कई भाषाओं का जानकार और कवि था।उसकी दो पत्नियाँ थीं भाटी रानी से 'बाउक' और दूसरी रानी से 'कक्कुक' पैदा हुए।इसी बाउक ने 837 ई.में प्रशस्ति उत्कीर्ण करवा कर अपने वंश की जानकारी दी थी।इसके बाद कक्कुक ने भी कई शिलालेखों को बनवाया और एक अच्छे राजा के रूप में पहचान पाई।
:
प्राप्त साक्ष्यों से पता चलता है कि बारहवीं सदी के मध्य मण्डोर के आसपास चौहानों का अधिकार हो गया था परन्तु किले पर प्रतिहारों की इंदा नामक शाखा का अधिकार रहा।अन्य प्रतिहार वंशियों ने शायद चौहानो के सामन्त बनकर शासन किया हो।1395 ई. में इन्दा प्रतिहारों ने अपने राजा हम्मीर से  परेशान होकर 'राठौड़' वीरम के पुत्र चूंडा को मण्डोर दहेज में दे दिया और इस प्रकार प्रतिहारों का प्रभाव समाप्त होकर धीरे धीरे सम्पूर्ण मारवाड़ राठौड़ों का हो गया।
:
🌹🙏
क्रमशः---12
आज के लिए इतना ही काफ़ी है फिर मिलेंगे #पाठकपुराण के साथ #राजस्थान_के_इतिहास_की_झलकियाँ_1  2 लेकर तब तक आप इसका आनंद लीजिये। बहुत बहुत स्वागतम।
#yqdidi #yqhindi #yqbaba 

Thursday, November 19, 2020

राजस्थान के इतिहास की झलकियाँ - 11

"जैत्रसिंह"
मेवाड़ के शौर्य का एक और पन्ना।
(1213 - 1252 ई.)
मेवाड़ की गद्दी पर जैत्रसिंह के बैठते ही जालौर में चौहान राज्य के संस्थापक कीर्तिपाल से गुहिल राजा सामन्तसिंह की पराजय का बदला लेने के लिए अपने समकालीन नाडौल के चौहान राजा उदयसिंह पर आक्रमण कर दिया।उदयसिंह ने अपने राज्य को बचाने के लिए अपनी पौत्री रुपादेवी का विवाह जैत्रसिंह के पुत्र तेजसिंह के साथ कर मेवाड़ और नाडौल में मैत्री स्थापित की।जैत्रसिंह ने मालवा के परमार राजा देवपाल को हराकर अपना अधिकार जमाया और गुजरात के सोलंकियों का मैत्री प्रस्ताव ठुकरा दिया।इधर दिल्ली में तुर्कों की जड़ें मज़बूत हो गईं तो "इल्तुतमिश" ने मेवाड़ को अधिकार में लेने के लिए आक्रमण कर दिया। जब अजमेर के चौहानों की शक्ति का पतन हो गया तो राजस्थान के विस्तृत भू-भाग पर तुर्को ने लूट ख़सूट शुरू कर दी थी।मेवाड़ अभी भी मोहम्मद गौरी और कुतुबुद्दीन ऐबक के आक्रमणों से बचा हुआ था।
1222 से 1229 ई. के मध्य 'इल्तुतमिश' ने मेवाड़ पर आक्रमण कर दिया।जय सिंह सूरि ने अपने "हम्मीरमदमर्दन" में लिखा है कि मुस्लिम सेना मेवाड़ की राजधानी 'नागदा' तक पहुँच गई। उसने आसपास के कस्बों,गाँवों को बर्बाद कर दिया और कई भवनों को नष्ट कर सैकड़ों लोगों की हत्या कर दी गई।
:
जब युद्ध के मैदान में जैत्रसिंह ने सीधे न कूदकर छापामार युद्ध नीति का उपयोग किया तो इल्तुतमिश की सेना के पैर उखड़ गए और मुसलमान पदाक्रांता भाग खड़े हुए लेकिन उससे पहले वे नागदा को नष्ट कर चुके थे। इसकी पुष्टि चीरवा के शिलालेख से होती है।
:
डॉ दशरथ शर्मा कहते हैं कि - जैत्रसिंह ने तुर्कों को पीछे खदेड़ दिया परन्तु मेवाड़ की राजधानी नागदा को बड़ी हानि उठानी पड़ी।
:
नागदा के नष्ट हो जाने के बाद ही गुहिलों ने चित्तौड़ को अपनी राजधानी बनाया और फिर आने वाली कई सदियों तक उसे यह गौरव प्राप्त हुआ।
:
इल्तुतमिश के इस अभियान ने दिल्ली के लिए भावी विजय-योजनाओं के मार्ग खोल दिये थे।
:
आबू शिलालेख से पता चलता है कि जैत्रसिंह के साथ सिंध के शासक "नसीरुद्दीन कुबाचा" से भी युद्ध हुआ जो मोहम्मद गौरी का एक प्रनुख ग़ुलाम और सेनानायक रहा।उसके सेना नायक खवास खां को गुजरात अभियान के दौरान खदेड़ दिया।
:
दिल्ली के सुल्तान नसीरुद्दीन ने अपने भाई जलालुद्दीन को कन्नौज से दिल्ली बुलाया।जलालुद्दीन को लगा कि उसकी हत्या की जा सकती है तो वह अपने साथियों सहित चित्तोड़ के आसपास की पहाड़ियों में छुप गया।सुल्तान ने उनको ढूंढने के लिये बहुत प्रयास किये किन्तु आठ महीने की खोजबीन के बाद भी कुछ हाथ नहीं लगा फ़रिश्ते ने इस समय को 1248 ई. के आसपास का बताया है। तारीख़े नासिरी का लेखक मिनहाज लिखता है कि जब उलूग ख़ाँ ( बलबन )को सुल्तान ने नाइब पद से हटाकर नागौर का इक्ता बना दिया तो उसने रणथम्भौर, बूंदी तथा चित्तौड़ तक लूटमार कर धनार्जन किया।राजस्थान के शिलालेख भी इस की पुष्टि करते हैं कि राजपूतों के कड़े प्रतिरोध के कारण बलबन को विशेष सफलता नहीं मिली।
:
डॉ ओझा कहते हैं कि- 
दिल्ली के ग़ुलाम सुल्तानों के समय में मेवाड़ के राजाओं में सबसे प्रतापी और बलवान राजा जैत्रसिंह हुआ जिसकी वीरता की प्रशंसा उसके विरोधियों ने भी की है।
:
जैत्रसिंह ने ही चित्तौड़ किले की मज़बूत प्राचीरों का निर्माण कराया।विद्वान और कलाकारों को आश्रय देकर मेवाड़ की ख्याति को बढ़ाया। 1253 ई. में जैत्रसिंह की मृत्यु हो गई और उनका उत्तराधिकारी तेजसिंह बना।तेजसिंह के समय का अंतिम शिलालेख वि. स. - 1324 ( 1267 ई. ) का मिला और उसके उत्तराधिकारी समरसिंह का प्रथम शिलालेख वि. स. - 1330 ( 1273 ई. ) का है। तेज सिंह ने 1267 से 1273 ई. के मध्य राज्य किया।
:
तेजसिंह ने वीरधवल जो कि 1243 ई. के आसपास त्रिभुवनपाल से गुजरात का राज्य छीनकर मेवाड़ की ओर बढ़ना चाहता था पर जैत्रसिंह ने उसके साथ मैत्री करने से इनक़ार कर दिया था से सामना हुआ गुजरात की सेना भाग खड़ी हुई इस युद्ध में मेवाड़ की जनधन हानि उठानी पड़ी। बलबन ने भी 1253 - 1254  ई. में हमला किया था किंतु उसे पराजय का सामना करना पड़ा और फिर कभी लौट कर नहीं आया।जैत्रसिंह की तरह तेजसिंह भी प्रतापी था।
:
तेज सिंह की मृत्यु कैसे हुई ये तो पता नहीं पर कुम्भलगढ़ प्रशस्ति,आबू शिलालेख,चीरवे के साहित्यिक कृतियों के आधार पर उसका उत्तराधिकारी माना जाता है वह भी अपने पिता और पितामह की तरह शक्तिशाली और वीर था। उसने 1299 ई. के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी के दो सेनानायकों उलूग ख़ाँ और नुसरत ख़ाँ ने बनास नदी को पार कर मडोसा के किले पर अधिकार कर लिया था।उस समय उलूग ख़ाँ सिंध से जैसलमेर के रास्ते चित्तौड़ आया था।"कान्हड़देव प्रबन्ध" इस घटना के प्रमाण देती है।जैन ग्रंथ तीर्थकल्प और रणकपुर मन्दिर शिलालेख यह बताते हैं कि गुहिल नरेश समरसिंह ने अलाउद्दीन को हराकर चित्तौड़ की रक्षा की। और मुस्लिम सेना नायकों से दण्ड लेकर उन्हें आगे जाने दिया।
:
चीरवे के लेख में समरसिंह को शत्रुओं का संहार करने में सिंह के समान अत्यंत शुर बताया है।
:
समरसिंह के समय पद्मसिंह,केलसिंह,कल्हण,कर्मसिंह जैसे शिल्पकारों के साथ ही रत्नप्रभ सूरि,पार्श्वचन्द्र,भाव शंकर,वेद शर्मा,शुभचन्द्र जैसे विद्वान मौजूद रहे।
:
🌹
आगे राजस्थान के इतिहास में क्या हुआ ये आपको अगली पोस्ट में बतायेंगे आज के लिए इतना ही काफी है।बने रहिये 🌹🌻🙏😊 #पाठकपुराण के साथ #राजस्थान_के_इतिहास_की_झलकियाँ_1  1 और पढ़ते रहिए अपने गौरवशाली अतीत के पन्नों को।
#yqdidi #yqbaba #yqhindi #गुलिस्ताँ #येरंगचाहतोंके साथ जय श्री कृष्ण।🌻🙏😊🌹🌼 सुप्रभातम।
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Thursday, November 12, 2020

राजस्थान के इतिहास की झलकियाँ-10

"बप्पा के बाद" 
भोज ने मेवाड़ में शान्ति बनाए रखी,महेंद्र की हत्या कर भीलों ने उनकी ज़मीन छीन ली।नाग केवल नागदा के आसपास अपना अधिकार बनाये रखा।शिलादित्य अधिक योग्य निकला उसने भीलों को हराकर अपनी भूमि बापस ली।अपराजित ने शिलादित्य का साथ दिया और गुहिलों का वर्चस्व बढाया।कालभोज के बारे में जानकारी नहीं ऐसा माना जाता है कि यशोवर्मन के सैन्य अभियानों में मदद की थी।खुम्मान को मुस्लिम आक्रमणकारियों को खदेड़ा किन्तु वे कौन थे ये विवादास्पद है।मत्तट से महायक तक का समय राष्ट्रकूटों,प्रतिहारों के साथ उलझने में गया और वे सामन्त बन कर रहे। 877 ई. से 926 ई. के बीच खुम्मान तृतीय ने गुहिल राजवंश को पुनः प्रतिष्ठित किया।भरतभट्ट ने इसे बनाये रखा।अल्लट ने देवपाल परमार को हराकर गुहिलों की सैन्य शक्ति को बढ़ाया।नरवाहन ने भी मेवाड़ को सुदृढ़ किया।
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शक्तिकुमार के शासनकाल में परमार नरेश मुंज ने चित्तोड़ के दुर्ग और आसपास के क्षेत्र को जीत लिया।
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परमारों को चालुक्यों ने हराकर चित्तोड़ पर अधिकार किया।अम्बाप्रसाद को चौहानों का सामने करते समय वाक्पतिराज से लड़ते हुए वीरगति प्राप्त हुई।उसके बाद गुहिलों में कोई ऐसा शासक नहीं हुआ जो उनकी प्रतिष्ठा को बापस लाता।वैरि सिंह और उसके उत्तराधिकारी विजय सिंह ने जरूर आहड़ क्षेत्र पर अपना अधिकार जमाए रखा।
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1171 ई. में सामन्त सिंह गद्दी पर बैठ जिसने 1174 ई. में चालुक्य नरेश अजयपाल को हराकर मेवाड़ को ख्याति दिलाई।कुछ बरसों बाद ही उसे जालौर के चौहान कीर्तिपाल ( कीतू ) के हाथों पराजित होकर भागना पड़ा।
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सामन्त सिंह के छोटे भाई कुमर सिंह ने चालुक्यों और सिसोदिया सरदार भुवनपाल की सहायता से कीर्तिपाल को हराकर चित्तोड़ जीत लिया।कुमरपाल सिंह के बाद पद्म सिंह और उसके बाद जैत्र सिंह गद्दी पर बैठा।
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1213 ई. से 1252 ई. तक कि बात करेंगे अगली पोस्ट पर बहुत बहुत स्वागतम आपका बने रहिये....
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सुप्रभातम साथियो आपका दिन शुभ हो।🌹🗡🗡🌹

राजस्थान के इतिहास की झलकियाँ - 09

"बप्पा-रावल" ( क्रमशः-02 )

जब उस युवा लड़को को नागदा का सामन्त बना दिया गया तो वहाँ के जो पुराने सामन्त थे विद्रोह करने लगे उसी दौरान किसी विदेशी आक्रमण की सूचना मिली अन्य सामन्त इस अवसर का फ़ायदा उठाना चाहते थे नव सीखिए सामन्त को सेनापति बनाकर युद्ध में भेज दिया।मैदान में जाकर नए जोश के साथ सेनापति ने आक्रमणकारियों को खदेड़ दिया और विजय प्राप्त की साथ ही उन विरोधी सामन्तों को भी समझाया तब किसी ने उनको सम्बोधित किया भई- ये है सबका बाप और वही बाप आगे चलकर 'बप्पा' हो गया। ऐसा सुना गया है कि मोहम्मद-बिन-क़ासिम की फ़ौज लेकर यज़ीद ने सिंध प्रदेश को जीत लिया और अपने क्षेत्र को विस्तार देने के लिए उसने चित्तोड़ पर आक्रमण कर दिया तब चित्तोड़ की रक्षा करने के लिए बप्पा ने उनसे युद्ध किया और जब मुस्लिम सेना भाग खड़ी हुई तो उनका पीछा करते करते अफगानिस्तान के ग़जनी शहर में जाकर अपना झण्डा गाढ़ दिया। तो वहाँ के शासक ने अपनी बेटी का ब्याह बप्पा के साथ कर दिया।इसी विजय के क्रम को आगे बढ़ाते हुए बप्पा ने ईरान,इराक़, तुर्क जैसे कई राज्य जीते और अनेक विवाह किए।कहते हैं कि बप्पा की मुस्लिम पत्नियों से 32 पुत्र हुए जिन्हें इतिहास में "नौशेरा पठान" कहा जाता है।बप्पा की हिन्दू पत्नियों से 98 सन्तान हुई। बप्पा ने अपने समय में टॉड के अनुसार-अजमेर,कोटा,सौराष्ट्र,गुजरात के अतिरिक्त हूण सरदार और जांगल प्रदेश के राजाओं को एकत्रित कर विदेशी आक्रमणकारियों को धूल चटा दी थी।
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इन बातों में कितनी सच्चाई है ये तो शोध का विषय है किन्तु बप्पा रावल की वीरता और पराक्रम को भी राजस्थान के इतिहास में सदैव याद किया जाएगा।
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कर्नल टॉड का गणित कहता है कि- वल्लभीपुर के पतन के 190 साल बाद बप्पा का जन्म हुआ। वल्लभी संवत विक्रमी संवत के 375 वर्ष पीछे चला इसलिए- 205+ 375 = 580 वि.स. अथवा 524 ई. में वल्लभी का पतन हुआ।यदि 190 साल बाद बप्पा का जन्म हुआ तो - 580+190=770 वि.स.का अनुमान है। इस समय चित्तोड़ का राजा मान-मोरी मौजूद था।डॉ गोपीनाथ कहते हैं कि वल्लभी का विनाश वि.स.- 826 ( 769 ई. ) में हुआ।इसमें अगर 190 जोड़ें तो समय बहुत आगे निकल जाता है जो ठीक नहीं।श्यामलदास के अनुसार बप्पक ने 734ई.में चित्तोड़ का किला जीता इसलिए उसका समय आठवीं शताब्दी का पूर्वार्द्ध मानना अधिक ठीक रहेगा।भण्डारकर भी इसी समय को ठीक मानते हैं।ओझा जी बापा की विजय 713 ई. के बाद सन्यास का समय 753ई. मानते हैं।जबकि डॉ गोपीनाथ शर्मा 727 ई. और 753 ई.को निर्मूल मानते हैं।उन्होंने सातवीं शताब्दी के तृतीय चरण के आसपास का समय ही उचित माना है।
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एक जनश्रुति के अनुसार- बप्पा ने चित्तोड़ के मौर्यवंशी राजा मान-मोरी को परास्त कर मेवाड़ क्षेत्र में एक स्वतंत्र राजवंश की नींव रखी जो "गुहिल" के नाम से विख्यात हुआ।
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बप्पा सौ साल तक जीवित रहे और नागदा में ही उनका देहान्त हुआ आज भी उनकी समाधि बप्पा-रावल के नाम से प्रसिद्ध है।
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बप्पा के उत्तराधिकारीयों के बारे में विशेष जानकारी नहीं मिलती कुछ नाम जो शर्मा जी ने दिए उनमें- भोज,महेंद्र,नाग,शिलादित्य,अपराजित,कालभोज,खुमान प्रथम,मत्तट,भरतभट्ट,सिंह,खुमान द्वितीय, महायक,खुमान तृतीय, भरतभट्ट द्वितीय, अल्लट, नरवाहन,शक्तिकुमार, अम्बाप्रसाद,उसके बाद 10 शासक ऐसे हुए जिनकी कोई जानकारी नहीं है।
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आज के लिए इतना ही आगे आपको बताऐंगे कि बप्पा के वंशजों ने क्या किया।
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अजमेर से प्राप्त सिक्के पर यज्ञ वेदी पर शिवलिंग के सामने बैठा नंदी और दण्डवत करते इंसान के साथ खड़ी गाय सिक्के के दूसरे पहलू में सूर्य और कुछ ऐसा ही साबित करता है कि बप्पा शिवभक्त थे और गौ-ब्राह्मण की सेवा सुरक्षा करने के लिए कृत संकल्प भी।
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भावों की मुट्ठी।

 हम भावों की मुट्ठी केवल अनुभावों के हित खोलेंगे। अपनी चौखट के अंदर से आँखों आँखों में बोलेंगे। ना लांघे प्रेम देहरी को! बेशक़ दरवाज़े खोलेंगे...