Saturday, March 28, 2020

ज़िन्दगी का तराना

नमस्कार!
टीम 'गुलिस्ताँ' सुनाती हैआपको-
"ज़िन्दगी का तराना"
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"ज़िन्दगी का तराना,जब भी हो गुनगुनाना!

मेहनत और हिम्मत के गीतों से सजाना।

मुमकिन नहीं हैं,आसाँ भी न इतनीं कि-

मंज़िलें मस्तमौला,मुश्क़िल है निभाना।

कोशिश के तीरों को तरकश में रखना।

फिर धैर्य और साहस से लक्ष्य मनाना।

जीवन के सागर में भँवर जब मिलेंगें। 

मिलेगा किनारा- कि हौंसलों को जगाना।

ज़िन्दगी का फ़साना कभी उदास कभी थोड़ा शायराना।

कभी तैरना है डूब कर इसमें,तो कभी किनारा है बनाना।

मुश्किलें बेइंतेहा आती हैं मंज़िल के हसीं रास्तों में-

कभी यहाँ खुशी की मरम्मत कि ग़म को है छुपाना।

कोशिश करो तुम हर रोज़ कुछ नया सीखने की,

कि अगले दिन तुमको पुराना कर देगा नया ज़माना।

ज़िन्दगी का फलसफा तो बारिश की बूंदों से सीखो प्यारे!

यूँ अम्बर से ज़मीन पे गिरना और मिट्टी में मिल जाना।

कुछ औऱ भी मकसद हो ज़िन्दगी का तो कुछ बात है!

वरना सब इनके पीछे हैं- कपड़ा,मकान औऱ आबोदाना।

हकीकत में रहकर ही सपनों को सजाना।

मंज़िल के लिए ज़रूरी है कदम बढ़ाना।

ज़िन्दगी लेगी इम्तेहान हर एक मोड़ पर,

मग़र ऐसे हालातों में तुम न घबराना।

किनारा कर लेना हर निराशावादी सोच से,

आशाओं की किरणों से रास्तों को सजाना।

मुश्किल है माना यह सफ़र क़ामयाबी का-

कोशिश के दम पर तुम अपना मुक़ाम पाना।

ज़िंदगी के हर दौर में मिला इक नज़राना 

करता रहा कोशिश बेइंतिहा,बुनता गया फसाना।

अरमान था मुश्किलों को चीरकर,बुलंदियों को छू जाऊँ!

काँटो भरी राह में भी,वक्त ने सिखाया मुस्कुराना।

मंज़िल की राह में भटका मैं,जैसे हो बेगाना सफ़र!

शायद चाहता था ख़ुदा मुझे इस तरीके से आज़माना।
 
दौर ऐसा भी आया कि,अपनों ने किनारा कर लिया!

मग़र मिली सफलता,कि जीवन की गहराइयों को मैंने जाना।।

जब भी नए सिरे से जिन्दगी को हो सँवारना!

मुश्किल होगी मगर ऐ इंसान!तू कभी न हारना।

कोशिश सभी करते हैं अपने हालात बदलने की-

पर कैसे मुमकिन है सब मुसीबतों से लड़ जाना!

मुश्किल है किस्मत एक रात में बदल पाए-

कि मझधार में फँसे को भी संभव,किनारे का मिल जाना।

सपनें पूरे करने के लिए ज़रूरी,उम्मीदों की अग्नि भी!

हो लगन सच्ची तो मुमकिन है गगन का क्षितिज छू जाना।

ज़िन्दगी का फ़साना,जब हो बतलाना ,

थाम लो धड़कनें और फ़िर जुट जाना!

कोशिश अगर तुमने की टूटकर तो,

मुश्किल कहाँ!कोई किनारा छूट पाना।

तय करनी अगर,तुमको मंज़िल सुनो फिर!

चलते चलते सफ़ऱ में,न कभी डगमगाना।

रास्ते में कईं तुमको पत्थर मिलेंगे-

लाँघना तुम उन्हें,लेकिन ठोकर न खाना।

ज़िन्दगी का तराना,जब भी हो गुनगुनाना!

मेहनत और हिम्मत के गीतों से सजाना।"
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कविवृन्द- shelly jaggi
Divyanshu pathak
dheerika sharma
Vishal vaid
Shaina ansari
Pragati k.shrivastava
 
🌹हम लिखते रहेंगें🌹
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Friday, March 20, 2020

खो बैठे

व्यवहारिकता भूल गए सब
सहनशक्ति को खो बैठे !
पर्व और अब उत्सव सारे
अपने मूल रूप को खो बैठे !

होली के हुड़दंग मिटाकर
गीत गोठ सब खो बैठे !
प्यार भरे दिल सूख गए सब
और अपनापन खो बैठे !

भाव मनभरे भूल गए सब
जीवन रस को खो बैठे !
यंत्र बने फ़िरते दिखते सब
मूल चेतना खो बैठे !

श्याम रंग में जो मीरा ने चूनर रंगी

मैं रंग दूं तुम्हें इश्क के गुलाल से
तेरे गोरे गालों को रंग दूं लाल से
आओ जरा मेरे साथ तुम खेलो
मैं रंग डालूं प्यार भरे एहसास से

मैं अपनेपन का रंग मिलाकर
अब ज़ज़्बातों को एक करें हम
जो शिक़वे गिले दिलों में पनपे
अब आओ मन से दूर करें हम

होकर मतवाले हम झूमें प्यार से
आओ रंग डालूं मैं तुमको
प्यार भरे एहसास से ।
छुप करके मत बैठे गोरी
मत बन कर बैठे तू भोरी
तन मन मेरे रंग में रंगजा
होली में तू मेरी बन जा।
मार कोई पिचकारी छोरी
मुझको अपने प्रेम से रंगजा ।
:
ऐसी मारी उसने पिचकारी
मैं अपना दिल गई हारी !
दईया रे दईया रंग डारी
मैं पूरी ही रंग डारी !
मैं तो जोगन बन बैठी हूँ
सब सुध बुध अपनी हारी !
प्यारी सी चितवन श्याम जू
मैं हो गई हूँ बलिहारी !
:

तन पर रंग लगाया तुमने
मन मेरा रंगीन किया
आँखों को मेरी इक उम्दा
उड़ता उड़ता ख़्वाब दिया !
:
आज धूल माटी से खेली खेली कीच ग़ुलाल से
कल लेकर के यारा आना तुम रंग क़माल के ।
:
लाल रंग बलिदानी लाना हरा रंग खुशहाली का
श्वेत रंग पावनता तेरी,पीला भक्ति उदारता !
:
नीला गहराई है मन की काला शक्ति प्रधानता
प्रेम रंग में होकर के गुलाबी
जीवन की अभिलाषाओं को
रंग बैंगनी मानना ।
:

सृजन के रंग

अगर स्त्री तुम न होती?
तो इस क़ायनात में कोई रंग न होता
ख़ुशी न मिलती न कोई दर्द ही रहता ।
सब कुछ निर्जीव सा बेरंग और बेज़ान होता ।
ज्ञान, श्रृंगार ,रस, निधि,जिज्ञासा,
और वैराग्य, तुमसे ही तो आता है ।

ख़ुदरंग मोहब्बत

वह दौड़कर आई और मेरे  दोनों गालों को रंग कर चली गई।
उस गुलाल की महक मेरी सांसो को महका रही है।
आज होली का पहला दिन है और वह मुझे बहका रही है।
उसकी यह ख़ुदरंग मोहब्बत मुझे
जाने कबसे अपना बना रही है ।
मन ही मन चाहने लगी थी वह जाने कबसे? सपने सजा कर बैठी थी कल के लिए उसके साथ जिसे मालूम ही नहीं कभी मुलाकात होगी भी या नहीं?
यह मोहब्बत है खुद रंग मोहब्बत अगर दिल से की जाए तो सारी कायनात उसे मिलाने में लग जाती है।
इस बार होली पर कुछ ऐसा ही हुआ-------
क्रमशः--01

डिजिटल इश्क़

अपने दिल को मेरे दिल से लिंक करलो
प्यार को दोस्ती से मिलकर सिंक करलो !
करना हो कोई बदलाव तो ओटीपी आए
मन को इस तरह से अपने मिंक करलो !
एक जमाने भर पहले देखा गया डिजिटल इंडिया का सपना सच होने लगा है।
अब तो यह इश्क और प्यार भी डिजिटल होने लगा है।
अब नहीं कबूतरों को भेजना पड़ता संदेश
अब नहीं रहता किसी को डाकिए के आने का अंदेश
यह नया युग है तकनीकी की क्रांति का
हौले हौले धीरे धीरे जीने लगती उस भ्रांति का।
:
🌺💕🌺🙏🌹🙏🌺🌺🙏

प्यार का संगम होने दो

अपने सारे एहसासों को नदिया बनकर बहने दो
जो धड़कन में शोर मचा है अब तो मुझको कहने दो !
उफ़न रहा दिल में एक दरिया मिलने को बेचैन बड़ा
अपने दिल को भी जाना तुम सरिता बनकर बहने दो !
तीरथ तीरथ घुम रहा था मैं तुमसे मिलने को हमदम
अब ख़ुद को मत रोको जाना प्यार का संगम होने दो !

तन्हाई

खाली खाली दिल है मेरा और बड़ी तन्हाई है
यादें बनकर रात अंधेरी अब आंगन में छाई है !
पुरवाई चलने से देखो छुपी कसक भी जाग गई
सूनी सूनी आंखों में अब मेरी बस रुसवाई है !

तालमेल

जैसे करती है वसुधा सुबह से सायं की ओर
मुझे तय करना है सफ़ऱ जिंदगी का तेरी ओर !
जैसे अनवरत साथ रहते हैं चाँद और चकोर 
निहारते है एक दूसरे को जब तक कि न हो जाये भोर !
अपनी धुरी पर घूमकर मिलना है मुझे दूर क्षितिज पर
कि बाकी और कुछ दिखे ही नही किसी भी ओर !
रखना है तालमेल बनाकर पंछियों सा हर दम
ऊँची से ऊँची उड़ान भरकर भी भुलाते नही अपना ठोर !

Saturday, March 7, 2020

ज़हरीला ग़ुलाल

:
माधुरी और दिव्या दर्द से कराह रही थी
गुलाल और रंग से उनके कपड़े और शरीर रंग गए
वो दोनों तो परीक्षा देने जा रहीं थी हाय ये क्या हुआ ?
होली के इस ज़हरीले ग़ुलाल ने उनकी पूरी साल भर की मेहनत पर पानी फेर दिया ।



:
होली का ख़ुमार पूरे जोश पर था सब अपनी अपनी मस्ती में झूम रहे थे।
कहीं भांग वाली ठंडाई कहीं गुझियों की मिठास बिखरी हुई थी।
सब अपनी अपनी टोली बनाकर रंग खेलने में व्यस्त थे।
सब के रंग पुते चेहरे एक ही तरह से दिख रहे थे ।
कोई पहचान में नही आ रहा था तभी ....
:
हुड़दंग मचाती रोहन की टोली गांव के चौराहे पर आ गई ।
अब चौराहे पर जो भी राहगीर गुजरता रोहन और उसके साथी सभी पर गुलाल और रंग फेंक कर उन्हें रंगीन कर देते।
कोई बचने की कोशिश करता तो उसके सामने आकर नरेश उसे रोक लेता पीछे से दौड़कर राजेश रंग डाल देता, तब तक रोहन भी गुलाल का ढेर उस पर उड़ेल देता ।
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यह कहानी है राजस्थान के सीकर जिले में आने वाले एक छोटे से गांव की जहाँ होली का हुड़दंग महीने भर पहले ही आरंभ हो चुका है और महीने भर बाद तक चलता रहेगा।
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माधुरी और दिव्या का आज एग्जाम है,दोनों अपने पापा के साथ पेपर देने के लिए जा रही थी।
गांव के चौराहे पर जैसे ही होली का हुड़दंग होते दिखा,पापा जी ने बाइक को रोक लिया और थोड़ी देर इंतजार किया,लेकिन जब होली के हुल्लड़ बाजो ने खेलना बन्द नहीं किया तो,बाइक स्टार्ट की और धीरे-धीरे चौराहे को पार करने लगे
:
राजेश पहले से इस मौके की तलाश में था बाइक के आगे खड़ा हो गया । ब्रेक लगाते तब तक तो राजेश ने रंग का पूरा ढेर फेंक मारा और रोहन ने माधुरी और दिव्या पर ग़ुलाल उंड़ेल दिया ।
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माधुरी के पापा के हाथ से बाइक छूट गई और फिसल कर गिर पड़ी । जिससे दिव्या और माधुरी भी नीचे गिर गई।
वो चीखते हुए बोले मुझे कुछ दिख नही रहा। बचाओ ! बचाओ ! उठाओ ! कौन है ? कोई है मेरी बेटियों को बचाओ उनका पेपर दिलवा दो।
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चौराहे पर सन्नाटा पसर चुका था।
रोहन, राजेश और उसके साथी भाग खड़े हुए ।
चौराहे पर खड़ी भीड़ में से कुछ लोगों ने घायल हुए माधुरी के पापा और दोनों बेटियों को उठाया और हॉस्पिटल लेकर दौड़े ।
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डॉक्टर ने ऑपरेशन रूम से बाहर आकर नम आंखों से बोला कि मुझे माफ कीजिए अब माधुरी के पापा देख नहीं सकते....
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घायल माधुरी और दिव्या को हॉस्पिटल से मरहम पट्टी करा कर सीधे परीक्षा केंद्र पर ले जाया गया लेकिन तब तक देर हो चुकी थी पेपर छूट चुका था।
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माधुरी और दिव्या के पापा की आंखें चली गई और दोनों लड़कियों का एग्जाम नहीं हो पाया जहरीले गुलाल ने उनकी पूरी साल भर की मेहनत मिट्टी में मिला दी और पिता की आंखों की रोशनी छीन ली ।
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ज़हरीला कैमिकल युक्त हो गया आज होली का ये रंग
जाने लेकर कर रहा ये हमारी ज़िंदगानी को बेरंग।
बढ़ रहा दिनोदिन हम इंसानों के दिलों में नफरत का ज़हर
जानें लेता हुआ ये रंग मचा रहा मेरे भारत में कहर ।

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कहानी का संदेश यह है कि 👉आने वाले होली के त्योहार के पर्व पर हमें "बुरा न मानो होली है"कहकर किसी की जिंदगी के साथ खिलवाड़ नहीं करना है।
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यह कहानी हमारी टीम--- 
" ये रंग चाहतों के " होली के हमजोली प्रतियोगिता के लिए कोरा कागज़ के लिए लिखी थी जिसका श्रेय-----
कैप्टन- दिव्यांशु पाठक
सदस्य- श्वेता मिश्रा जी
          - कोमल शर्मा जी
     - डॉ सीमा शकुनि जी
          - सुधा जोशी जी
          - मैजिक वॉइस जी 
को जाता है । मैं इनका आभारी रहूँगा ।

भावों की मुट्ठी।

 हम भावों की मुट्ठी केवल अनुभावों के हित खोलेंगे। अपनी चौखट के अंदर से आँखों आँखों में बोलेंगे। ना लांघे प्रेम देहरी को! बेशक़ दरवाज़े खोलेंगे...