द्वैत से समझिए----
सूक्ष्म और स्थूल
आत्मा और मन
प्रेम और भूख !
:
परस्पर एक दूसरे का मान रखना
और अपने दिल में स्वाभिमान भी
यही तो "प्रेम" का मूल स्वरूप है
और जीवन का पर्याय भी
क्योंकि सम्मान ही प्रेम है !
प्रेम है इसलिए सम्मान नही
सम्मान है इसलिए प्रेम है !
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