Friday, January 31, 2020

प्रेम बुद्धी की पकड़ से बाहर की चीज है !

जीवन बहुत सारे घटकों से
मिलकर ही पूर्ण होता है !
जैसे हवा पानी अग्नि
आकाश पृथ्वी होता है ना !
इन्हीं सारी चीजों को हम
धीरे-धीरे बढ़ाते हैं !
आवश्यकता के अनुसार
धीरे-धीरे खर्च भी करते हैं !
मन बुद्धि और आत्मा
इनके विस्तार के लिए भी
कुछ खास इनमें होता है !
मन में भावनाएं सकारात्मक,
नकारात्मक भी !
बुद्धि में बोध समझदारी,
यह कहा जाए कि "जागरूकता"
"आत्मा" प्रेम के स्वरूप को
समाहित किए होता है !
इसलिए - प्रेम आत्मा का विषय है -
हम इसे मन और बुद्धि से
जोड़कर समझ नहीं पाते !

प्रेम सिर्फ़ सम्मान है !

द्वैत से समझिए----
सूक्ष्म और स्थूल
आत्मा और मन
प्रेम और भूख !
:
परस्पर एक दूसरे का मान रखना
और अपने दिल में स्वाभिमान भी
यही तो "प्रेम" का मूल स्वरूप है
और जीवन का पर्याय भी 
क्योंकि सम्मान ही प्रेम है !
प्रेम है इसलिए सम्मान नही
सम्मान है इसलिए प्रेम है !

प्रेम क्या है ?

सुनो
मैं ईश्वर को प्रेम लिखता हूँ
क्योंकि वह भाव है देने का
उसी तरह जीवन दिया है 
बिना कुछ लिए दिया है ना !
इसे स्वीकारते हो या नही
हाँ तो कुछ भी छीना नही
अब तुम्हें प्रेम से ही इसे
विस्तार देना है !
:
कुछ को विशेष मानकर
स्वयं जोड़ लेता है आशाएं
अपने लिये कुछ उम्मीदें भी
महत्वकांक्षाएं लेकर पड़ता है
बंधन में और दोष प्रेम पर रख
स्वयं को निर्दोष साबित करता है !
प्रेम प्रदीप्ति हृदय में हो तो
क्या भूख क्या प्यास ?
जठराग्नि को बल ही नही
मधुरता के आभास से तृप्त
स्वयं की सुध रहती ही कब है !
:
प्रेम कभी रंग रूप अमीरी गरीबी
से कोई ताल्लुक़ नही रखता
लैला अपनी सांवली रंगत से भी
मजनूं को दिवाना बना दी !
हीर ने तोड़ी ग़रीबी की लकीरें
बदल दी अमीरी की तक़दीरें !
ढोला मारू लाखा बंजारा
शिरीन ख़ुशरों जैसे प्रमाण कम है क्या ?
:
आज भी कहीं न कहीं कुछ ऐसे किस्से सुनने को अचानक मिल जाते है और हम बरबस कह उठते है---
"प्रेम" अभी भी इंसानी बस्ती में बाक़ी है ।
☕💕💕🙏

Thursday, January 30, 2020

प्रिये

सूने आकाश को जब भी देखा प्रिये
एक सितारा मुझे झिलमिलाता दिखा
था खड़ा मुद्दतों से प्रतीक्षा में वो
जाने कितना कोई उसको प्यारा लगा !

प्रेम की तुम परीक्षा न लेना प्रिये
हर हाल में पार कर जाऊंगा !
तुम अंधेरे में शम्मा जलाओगी तो
मैं पतंगे के मानिंद जल जाऊंगा !

जीवन प्रेम करने के लिए ही कम है फ़िर क्यों हम नफ़रतों को चुनते हैं !
हर खुशी ग़म में साथ रहने की कोशिश के पुलिंदे बुनते हैं !
साथ बैठकर सुलझा लें अपनी मुश्किलें धीरे धीरे से...
क्या पता है इसलिए हम मोहब्बत के धागे बुनते हैं !
तमाम ख़्वाहिशें जो हम करते हैं ढह जाती हैं
फ़िर किस तरह अपनी धड़कन की सुनते हैं !
कोई पता नही ?

मैं

1.
मैं बृज का एक अल्हड़ लड़का बस प्रेम बांटने निकला हूँ
मैं जीवन के इस पतझड़ में बस बसंत बांटने निकला हूँ !
जिस बिछुड़न की अग्नि को ये शीतलहर भड़का बैठी
मैं मानसरोवर के जल से ये आग बुझाने निकला हूँ !
2.
मैं चंचल सी कुसुमकली बस सुगंध बांटने निकली हूँ
मैं सूने आँगन में उसके उल्लास बांटने निकली हूँ !
पर स्वभाव से उसके कैसे मैं अनभिज्ञ रही अब तक
मैं एक भँवरे पर जाने क्यों ये दाव लगाने निकली हूँ !
:
कपकपाती हुई इन हवाओं में तो
मेरे महबूब की स्वांस का जोर है !
फूल की पंखुड़ी में जो था फंस गया
आज उसकी ही धड़कन में शोर है !

जब इश्क़ किसी से हो जाए

जब इश्क़ किसी से हो जाये तो दिन भर चैन नही मिलता
रातें कटतीं तारे गिन गिन पल भर आराम नही मिलता !

पीली फ़टने को होते ही जब एक जम्हाई आती है
तब ही उसकी परछाई सपनों में मिलने आती है !

सिरहाने में बैठ मेरे वह देख मुझे मुस्काती है
जब आलिंगन मैं करता हूँ तो आँख मेरी खुल जाती है !

फिर पूरे कमरे में नज़र घुमा मैं अपना सिर खुजलाता हूँ
वह फ़िर आएगी सपने में यह सोच के मैं सो जाता हूँ !

आज का युवा

शब्द रूप रस गंध और स्पर्श
अब इनका प्रभाव चरम पर है !
 चेतना का स्तर अहंकार ग्रस्त
अब मन में तनाव चरम पर है !
:
मुझे कुछ भी पता नही अपने ठौर का
मैं युवा हूँ भई इस आज के दौर का !
देश दुनिया गीत मीत संगीत सब है
जब तक कि पत्थर फ़िके ना औऱ का !
:
मैं स्वयं से इतर कुछ देख नही पाता हूँ
तर्क वितर्क की उलझनों में फंस जाता हूँ !
इनसे निकलने का रास्ता नहीं मिलता
मैं स्वयं ही स्वयं से कुतर्क कर जाता हूँ !!
:
मेरे जीवन का लक्ष्य प्रतिस्पर्धा बन गया है
मैं सिलेबस के भरोसे बड़ा जोर आजमाता हूँ
जब बात बन आती है कोई सामाजिक मुद्दे की
मैं दौड़कर इंटरनेट की शरण में आता हूँ !
:
बात क्या है क्यों है कैसे विचार करूँ
मैं भी उसी भीड़ में मिल जाता हूँ !
आज के दौर में जकड़ा हुआ मैं
बस आज़ादी आज़ादी चिल्लाता हूँ !!
:
अकर्मण्यता के शिकार हुए हम
वाद विवाद तक सिमटकर रह गए !
संस्कृति संस्कार सारे अश्क़ बनकर बह गए
अब तो बस यही है कि हम वफ़ा करके भी तन्हा रह गए !

यसश्वी बनो

हमारा आज जब कल की कहानी कहता है
कल कलकल करता आज में ही बहता है !
हमारा साहित्य हमारी विरासतें क़माल हैं
आध्यात्म का ज्ञान हमारी रगों में बहता है !


मैं सभ्यता और धर्म की माँ की ओर से हूँ
इस बात की संसार गवाही देता है !
जीवात्मा में आत्मा परमात्मा का अंश है
दुनियां के सामने सिर्फ़ भारतीय संत कहता है ।

भिखारी को भीख में तो तिरस्कार ही मिलता है !
प्रेम के बदले तुम्हें दुःख मिला यह सोचते हो
लेने देने का भाव है तो हानि लाभ तो होगा ही
यसश्वी बनो देने वाले को हमेशा लाभ ही मिलता है !

"राधा"

अपने विचारों में कृष्ण को लिपटते देखा है
मैंने अपने भावों में कृष्ण को सिमटते देखा है !
होठों पे छाई मुस्कुराहट तो कभी
जिह्वा पे आई मिठास के रूप में !

"राधा" का विचार मन में जब भी आता है
मन का कुमलाया कमल विकसित हो जाता है !
पंखुड़ियों को पल्लवित होते देखता हूँ
कृष्ण को बदलता देख कमल के रूप में !

हृदय सरोवर के स्थिर जल में
कंकर मार कर देखता हूँ जब भी
लहरें बलखाती "राधा" बन जाती हैं
कृष्ण तल में दिखते कंकर के रूप में !

वो

मैं मोहब्बत की गलियों में फ़िरता रहा
वो शराफ़त से नज़रें चुराते रहे!
देख उनको हुए हम तो गुमसुम खड़े
वो फ़िर भी बहुत मुस्कुराते रहे !

दिल की गहराइयों में उतर सी गई
वो मुस्कान उस वक़्त महबूब की
लाल होठों की शोख़ी जलाती रही
फ़िर भी नज़रों से नज़रें मिलाते रहे !

धड़कनो की रवानी का क्या हम कहें
बेसबब बे मुरब्बत सी होने लगीं
वस मेरा ना रहा छाई बेचैनियां
वो अदाओं से फ़िर भी बनाते रहे !

मौसम का मिज़ाज

मौसम का मिज़ाज कुछ बदला सा है
जो कुहासा हुआ आज उजला सा है
चहकते हुए इन परिंदों का स्वर
मन्नतों में उठी उन दुआओं सा है !

शर्द रातों में जो बात ठिठुर सी गई
दिन सम्हलते हुए उन ख़यालों सा है
जो मोहब्बत में होकर थी निष्ठुर बनी
शोम्य होते हुए कुछ सवालों सा है ।

मैं दिवाना उसे ढूंढता ही रहा
आज पाया कि वो तो जमाने में है
जिसको देखा मुझे वो तुझी सा दिखा
मुझको लगता है "पाठक" मयखाने में है !

तुम यूं उदास मत हुआ करो !

तुम यूं उदास मत हुआ करो
ऐसे गुमसुम मत रहा करो
मेरी नादानियों की बदौलत
खुद से खफा ना हुआ करो !

तुम यूं तन्हा मत हुआ करो
ऐसे मुझसे मत रुठा करो
मेरी मुस्कुराहटों की बदौलत
खुद से खफा ना हुआ करो !

तुम यूं रुसवा मत हुआ करो
ऐसे शिकवा मत किया करो
मेरी शिकायतों की बदौलत
खुद से खफा ना हुआ करो !

थोड़ा वक़्त लगता है !

मुसीबतें आती हैं, टलने में थोड़ा वक़्त लगता है
दिन भी आएगा, रात गुजरने में थोड़ा वक़्त लगता है !
तुम चांद और सितारों के आने का लुत्फ़ लो तबतक
दुख दर्द जिद्दी हैं टलने में इनको थोड़ा वक्त लगता है !

थोड़ी देर रुककर , फिर चल देना मेरे यार
ठोकर लगने के बाद संभलने में थोड़ा वक़्त लगता है !
तेरे वजूद से ही तेरी चमक लौट आएगी यकीन करना
टूटी हुई आशाओं को जुड़ने में थोड़ा वक़्त लगता है !

जो भो सोचा है कर दिखायेगा भरोसा है मुझे
गरजते बादलों को बरसने में थोड़ा वक़्त लगता है !
फ़िर से उगेगी फ़सल प्यार की उम्मीद है मुझे
रेगिस्तान को खेत बनने में थोड़ा वक़्त लगता है !

पानी से बर्फ बनने में थोड़ा वक़्त लगता है
ढले हुए सूरज को निकलने में थोड़ा वक़्त लगता है !
थोड़ा धैर्य रखो, थोड़ा सा ज़ोर और लगाओ
दरवाजा जंग लगा हुआ है खुलने में थोड़ा वक़्त लगता है !

चाँदनी आज रूठी है क्यों चाँद से

चाँदनी आज रूठी है क्यों चाँद से
ये अंधेरा फिज़ाओ में जोरों से है
धड़कनें बढ़ रहीं नींद भी है नही
ख्वाब भी रूठ बैठे मेरी आंख से !

कुछ तो हुआ इन हवाओं को भी
रूठ कर के यहां आज बहने लगीं
टूटकर शाख से कितने पत्ते गिरे
ये पतझड़ है मुझसे यूं कहने लगी !

नफरतों का बबंडर भी मिट जाएगा
ये पतझड़ भी जल्दी निपट जाएगा
मुझको उम्मीद है तुम भरोसा रखो
ऋतु बसंती में दामन लिपट जाएगा !

सुनो तुम

जब आएंगे तूफ़ान तू डरना नहीं
तेरी कश्ती ख़ुशी से सम्हालूंगा मैं
डगमगाते डगों से डगर नाप कर
तेरे ख़्वाबों को अपना बनालूँगा मैं !

तेरे दिल में जो गहरा समंदर छुपा
नाव जीवन की उसमें बहा लूंगा मैं
थामकर तेरी नौका की पतवार को
पार एक दिन किनारे लगा लूंगा मैं !

नाव जब भी किनारे से लग जायेगी
एक प्यारा सा घर फ़िर बनालूँगा मैं
तुम रहोगी बनकर उसकी शोभा
तेरे सपनों से उसको सजा लूंगा मैं !

सींचकर प्यार से पौध आँगन में लगी
मेरे आँगन में फुलवारी खिलाऊंगा मैं
जब निकलेंगी कलियाँ मोहब्बत भरी
तेरा गजरा उन्हीं से बनाऊंगा मैं !

बेरुख़ी

बेरुख़ी से तेरी मैं बिख़र जाऊंगा 
छूटकर आईने सा बिख़र जाऊंगा !

तुम अगर भूलसे भी भुला दोगी तो
ओढ़कर तेरी यादों को सो जाऊंगा !

हे कृष्ण

तेरी प्यारी बातों पे मुस्कुराता हूँ मैं
सुबह होते ही तुझे गुनगुनाता हूँ मैं !
आज कल और कल की बेहतरी में
तेरा नाम लेकर के उठजाता हूँ मैं !

हे कृष्ण
ज्ञान प्रेम विज्ञान सांख्य का
तू ही तो उन्नायक है
धर्म कर्म वैराग्य योग का
तू ही तो अधिनायक है !
:
हे कृष्ण
तेरी वंसी की धुन को
इन हवाओं में पाता हूँ मैं 
देख तेरे जीवन का दर्पण
स्वयं से जुड़जाता हूँ मैं !

मेरी सुबह....

जिन सपनों को लेकर मैं सोया था
सुबह सच करने उनको उठ गया !
सुनहरी धूप निकली अंधेरा मिटा
और फ़िर मैं उन्हें पाने में जुट गया !

शिव शक्ति की संतानों को यह पाठ पढ़ाने आया हूँ !

कर्म मर्म के भेद जान कर
मैं कुछ दिन जीने आया हूँ !
जो क़िरदार अधूरे से हैं
मैं पूरा करने आया हूँ !!

तरण तनूजा तरुवर बनके
मैं दीन हेतु हित साधन हूँ !
मैं बीहड़ की बंजरता में
उर्वरक मिलाने आया हूँ !!

इक दिन बंजरता बीहड़ की
मैं खेत बनाकर मानूंगा !
बीज रोपकर अपनेपन का
अपने सा सबको जानूँगा !!

तुमसे ही

तेरे साथ बैठ कर सुबह होने का इंतजार करूँ
निहारूँ रात भर सितारों को और चाँद से बात करूँ !
जो भी ख़्वाहिशें हैं खुश रहने की मुझे इस जीवन में
तेरे साथ पूरी हों और तुमसे ही शुरुआत करूँ !

द्वैत से अद्वैत

दिल
और दिमाग़ में
रहता है जो
जुड़ जाता जैसे
मन और आत्मा
के साथ
द्वैत से अद्वैत और
अद्वितीय !

तेरा ख़्याल आया

दूरी ने कर दिया है तुझे और भी क़रीब
तेरा ख़याल आया और हम पहचान गए !

मुझे तुझमें कुछ तो लगता है अज़ीज़
जब भी तुमने कुछ कहा हम मान गए !

इश्क़ है ये या कुछ और हम नही जानते
तेरी आँखों में देखा और हम जान गए !

जब भी कोशिशें की हैं दूर होने की
ये बड़ा ग़ज़ब है कि आप बुरा मान गए !

तमाम उम्र साथ जीने के ख़्वाब सजाये है
ख़्वाब पूरे भी होते है हम हक़ीक़त मान गए !

ये दिल अपने आप कहता है कि वह तुम हो !
जो ख़यालों में अक़्सर मेरे रहता है वह तुम हो !
:
समंदर सी आंखों में तेरी जो मछलियां दिखती हैं !
पकड़ लूं उन्हें पर कोई रोकता है जैसे वह तुम हो !

तुमसे मिलकर

मैं कविता मोहब्बत की लिखते हुए
बस तुम्हें सोचकर गुनगुनाने लगा
मैं काज़ल दवात-ए-मुरव्वत लिए
तेरी पलकों में पंक्ति सजाने लगा !
:
मैंने बिखराई स्याही किसी छोर पर
नूर आँखों का तेरी झलक ही गया
जब भी टकराई मेरी क़लम कोर से
मन बहकने लगा तन महकने लगा !

बसंत

धरती मां ये झूम के बोली मस्त गगन को चूम के बोली
चली पवन पुरवाई रेे कैसी ऋतु ये बसंती आई !
:
विद्या दायिनी माँ मुझे सात्विक ज्ञान दे
दूर कर मन का अंधेरा मुझ पर उजाले वार दे !
:
बसंत पंचमी की हार्दिक शुभकामनाएं आपको
आप के जीवन में सदाबहार बसंत खिलता रहे
उल्लासित हो हर समाज और हृदय में प्रेम फ़लता रहे !

अवशेष पुरुष

मर्द और नामर्दों की भीड़ में
मैं अवशेष (पुरुष) जो
प्रकृति के साथ हो रहे अन्याय से
दुःखी हो ताण्डव कर रहा है !
:
उन्हें यह समझाने के लिए कि---
जब समंदर में आग लगती है
वह किसी पानी से नही बुझती !
:
प्राकृतिक आपदाओं का प्रबंधन
मानव ज़ोर लगा कर करता है
तोड़ तोड़ कर मानवता को
जीने के हठ में मरता है !


तुम्हारा प्यार मेरी चेतना

अंतर्मन के स्पंदन में
जब प्रेम प्रस्फुटित होता है
इक सुंदरतम वातावरण नया
उस वक़्त हृदय में होता है !
:
जब कल कल करता परम् द्रव्य
रग रग में प्रवाहित होता है !
मन के कोने कोने में
हर भाव सात्विक बीज यहां
होले से अंकुरित होता है !
:
तुम मेरी आत्मा हो
तुम्हारा प्यार मेरी चेतना 
अपनी आत्मा को चोट देकर
सुख प्राप्ति की कल्पना मूर्खता है !
वैसे भी बिना चेतना के
कोई जीवन नही होता !
:
सिंचित कर विश्वास आस से
बाढ़ लगा कर हर प्रयास से
जब पौधा बढ़कर पारिजात का
कल्पबृक्ष सा होता है !
तब घनी छांव में बैठ पथिक
नफ़रत की जलन मिटाता है
स्वयं समर्पित हो अभिन्न वह
अपने ही इष्ट सा होता है !

तेरे बिन

आँसू जब तेरे आँचल में
मेघ बने अट जाते है !
सच बोलूं तो इसी बजह से
दिल में बादल फट जाते है !
:
तुम तो कहते हो कि
नही प्यार मुझे हो पाता है !
पर शिव ताण्डव जब सुनता हूँ 
क्यों ख़्याल तुम्हारा आता है !
:
अक़्सर इस धड़कन ने यारा
बस तुमको ही ख़ूब पुकारा है !
कैसे तुम फिऱ कह देते हो
कोई मुझको नही प्यारा है !

अब तो दया करो कुछ बादल

अबतो दया करो कुछ बादल
नभ से थल तक है जल ही जल !
:
मिट्टी के घर धसक रहे हैं
पत्थर के दिल दरक रहे हैं
सह में बच्चे सिसक रहे हैं
अपनी मां से चिपक रहे हैं
घर में बाकी दाल न चावल !
अब तो ......
:
खतरे के निशान के ऊपर
नदी बहरही सागर बनकर
डूबी फसलें राह खेत घर
आधा डूबा बूढ़ा पीपल !
अबतो दया...
:
टूटी जामुन आम की शाख़ें
आशाओं की भीगी आंखे
घायल 'पंछी' बोझिल पाँखें
गाय रम्हाये बछड़ा काँखे
मंद हुई जीवन की हलचल !
अब तो दया......
:
ज्वर शर्दी जुक़ाम की पीड़ा
महँगी दवा दाम की पीड़ा
छूटे काम तमाम की पीड़ा
समझो भूंखे राम की पीड़ा
गिरवी है चांदी की पायल
अब तो दया .....

सुनो तो

मैं तुमसे प्रेम करता हूँ
आज कल और हमेसा से ही
इसलिए नही की तुम भी मुझे
उतना ही प्रेम करो और अपने
स्वयं के उद्देश्य भूल....
मेरे मोह पास में फंसकर
अपने आप को गुलाम बनालो !

तुम

फ़ेरकर आंख तुम रूठ बैठी हो यूं
छिनगई मेरी दुनियां की रंगीनियां
नफ़रतों की हवाएं हैं बहने लगी
बढ़ गयी बादलों में भी वीरानियाँ !

देख कर बादलों की ये वीरानियाँ
शाम तन्हाई में दामन भिगोने लगी
ना सितारे दिखे चाँद भी जा छुपा
रात आकर के आँगन में रोने लगी !

रातरानी उगाई थी गमलों में जो
आज घबराई घबराई मुझको लगी
इन अंधेरो का जबसे है मेला लगा
तबसे तुलसी भी कोने में सोने लगी !

प्रेम की व्याकरण

प्रेम पंथ की बनकर किताब
तुम मेरे सामने आती हो !
एक अल्हड़ से मस्त भ्रमर को
तुम पाठक कर जाती हो !!

स्वर व्यंजन के शब्द जाल को
चुपके से यार बिछाती हो !
सन्धी कर खुद हो समास
तुम प्रत्यय मुझे बनाती हो !!

क्रियाविशेषण सर्वनाम सब
तुम उपसर्ग लगाती हो !
महाप्राण का कारक बन
अन्तःस्थ हृदय हो जाती हो !!

इस प्रेमग्रंथ की व्याकरण
पढ़ने में तो सहज है
समझ मुश्किल से आती है !!

तेरा ये अव्ययीभाव स्वरूप
ठगधिकार सा लगता है !
इसकी आत्मनेपद प्रक्रिया
मुझे अपने साथ कभी
हलन्त् सा भी नही लगाती !!

भावकर्म प्रक्रिया बनकर
छन्द बन तो जाता है!

स्वर विचार संयुक्ताक्षर का
ध्वनि विचार जब करता हूँ !
तब धड़कन से धड़कन जुड़कर
सूत्र महेश्वर बनता है !!

Wednesday, January 29, 2020

मैं और तुम

इंसान के रूप में तुम औरत, मैं मर्द ।

इंसान लफ़्ज़ एक है लेकिन

इसे कई अर्थ मिले।

मेरे तेरे जिस्म की पहचान के लिए ..

तुम महबूबा हो, पत्नी हो, दासी हो,

बेटी हो, वेश्या हो।

तुम्हें जिस नज़र से देखा दिखी

पर मुझे किस नज़रिये से जाना

मैं महबूब हूँ, पति हूँ, पिता हूँ, बेटा हूँ

या यूं कहूँ आवारा, अय्याश, बेग़ैरत हूँ ।

तुम्हें लगता है मैं हमेशा से ऐसा हूँ !

एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप करते कराते !

आज हम कहाँ पहुँच गए पता है?

समलैंगिकता ,एकांकी,लिवइन,

बिना ज़िम्मेदारी के सबकुछ पाने की दौड़ में 

जानता हूँ तेरा जिस्म नुचा है और मेरी आत्मा ।

तुम एक राज़ हो ,मैं एक क़तरा

तुम्हें समझना होगा और मुझे जज़्ब करना होगा ।

कभी तो ख़त्म करना होगा ये द्वंद प्रतिस्पर्धा को छोड़

अनुस्पर्धा का अनुसरण भी तो हो सकता है।

क्या हम एक दूसरे के पूरक बनेंगे

अपनी सदियों पुरानी विरासत की तरह ।

शिव है तो शक्ति है ।

शक्ति है तो शिव का वजूद है।

भावों की मुट्ठी।

 हम भावों की मुट्ठी केवल अनुभावों के हित खोलेंगे। अपनी चौखट के अंदर से आँखों आँखों में बोलेंगे। ना लांघे प्रेम देहरी को! बेशक़ दरवाज़े खोलेंगे...